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यौन हिंसा मानसिक विकार से कहीं अधिक सामाजिक विकार है


‘बलात्कार’ एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनते ही शरीर सिर से लेकर पांव तक घृणा से भर जाता है, लेकिन ना चाहते हुए भी हमारा इस शब्द से हर रोज़ पाला पड़ता है। हमारे देश में कभी झुग्गियों में रहने वाले बच्चों तथा बच्चियों के साथ मां-बाप के काम पर जाने के बाद बलात्कार हो जाता है, तो कभी मां की अनुपस्थिति में खुद बाप ही अपनी बच्ची से छेड़खानी और उनका रेप कर देता है, तो कभी कॉलेज छात्रा का, कभी अस्पताल में नर्स, महिला मरीज का, कभी सड़क पर, कभी बस में, कभी स्कूल में छोटे बच्चे-बच्चियों के साथ छेड़खानी अथवा दुष्कर्म किया जाना, कभी दफ्तर में महिला साथी का यौन शोषण, विश्वविद्यालय की छात्राओं पर पेशाब और वीर्य से गुब्बारे मारे जाना आदि आदि। 

ये सूची है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही फिर भी हमारे यहां लोग आंकड़ों को गम्भीरता से ना लेते हुए ये कहते पाए जाते हैं कि विदेशों में माने पश्चिमी देशों में सबसे ज़्यादा यौन अपराध अथवा बलात्कार होते हैं, मतलब ये जानकर संतोष कर लेना चाहिए कि विदेशों में हमारे यहां से ज़्यादा यौन हिंसा होती है, तो हमारा समाज पश्चिमी देशों के समाज से अच्छा है। वाह! क्या तर्क है? क्या हमें हमारे देश की बदनामी के डर से असलियत छुपानी चाहिए?

ज़रा नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर नज़र डालिए फिर तफसील से विचार कीजियेगा।

  1. हमारे देश में हर एक घंटे में चार बलात्कार होते हैं।
  2. हर 3.8 दिन में पुलिस कस्टडी में एक बलात्कार होता है।
  3. हर चार घंटे में एक गैंगरेप की वारदात होती है।
  4. हर 2 घंटे में एक बलात्कार का असफल प्रयास होता है।

क्या इन आंकड़ों को देखकर हमें डरने/चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है? इन आंकड़ों और इस परिस्थिति को देखकर समझकर हमारा दिमाग फट जाना चाहिए। हृदय खंडित हो जाना चाहिए कि ऐसी स्थिति में हमारे बच्चे और माताएं-बहनें और खुद पुरुष कैसे सुरक्षित रहेंगे?

(जब एक पुरुष साथी अपने दूसरे साथी की फटी पैंट देखकर उसके प्राइवेट पार्ट के ज़रिये कंप्रेसर पंप से हवा भर देता है और फिर उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और उसका साथी कहता है कि उसने तो सिर्फ मज़ाक में ऐसा किया था। अरे किसी भी व्यक्ति को इतना खतरनाक और घिनौना मज़ाक कैसे सूझ सकता है? यदि उस आदमी की जगह कोई लड़की या महिला होती तो वो उसका क्या हश्र करता ये सोचते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं और शरीर ठंडा पड़ जाता है) 

बहुत हो गयी आंकड़ो पर चिंता अब सीधे इस बात पर विचार  करते हैं कि यदि हमारे समाज में किसी एक भी लड़की या महिला अथवा पुरुष का भी बलात्कार अथवा शोषण होता ही क्यों है? इस यौन हिंसा अथवा अपराध की उपज क्या है? इसको उर्वरा ज़मीन उपलब्ध कहां से होती है? इन सारे सवालों का जबाब भी हमारे सामाजिक तानों-बानों में ही है कि हमारा समाज ही सभी तरह के अपराधों (लेकिन हम यहां पर केवल यौन हिंसा पर ही बात करेंगे) को उपजाऊ ज़मीन मुहैया कराता है और फिर जो उपज तैयार होती है तो उसे पोसता भी समाज ही है।

अब आप ये कहेंगे ये क्या अनर्गल बात कह दी परन्तु ये अनर्गल नहीं सत्य है, कड़वा सत्य जिसे स्वीकार कर पाना अत्यंत कठिन है इसे आप आगे समझेंगे।

दरअसल, समाज बनता है कई घर और बस्तियों को मिलाकर और घर बनता है परिवार के कई सदस्यों को मिलाकर जिनमें दो महिला और पुरुष मुख्य किरदार होते हैं और बाकी सदस्यों के किरदारों को इन्हीं महिला-पुरुषों द्वारा भिन्न-भिन्न आयु अवस्था में निभाया जाता है।

इस प्रकार समाज की शुरुआत घर से ही शुरू होती है। ऐसे में यदि घर में बच्चों की परवरिश में भेद किया जाने लगे माने लड़का और लड़की के खान-पान और खेल-कूद से लेकर पढ़ाई-लिखाई तक में स्पष्ट फर्क किया जाने लगे, उन्हें ये बताया जाये कि लड़का राजा बेटा और शेर की तरह मज़बूत और सबकी रक्षा की ज़िम्मेदारी वाला होता है और लड़की?

लड़की तो जन्म से ही कमज़ोर और पुरुषों की दया पर पलने वाली होती है। लड़की भोग की वस्तु है पुरुष के बिना तो लड़की का वजूद ही नहीं है, वो तो उसी के रहमोकरम पर जियेगी। इसलिए वो घर में ही रहकर चूल्हा-चौका और बच्चों को संभाले और पति की पूजा करे। फिर चाहे पति और घर के बाकी पुरुष मिलकर पत्नी/महिलाओं का शोषण ही क्यों न करें।

लड़की है महिला है तो बाहर किसी को कुछ बताएगी नहीं केवल सुशील/सुभग बनके रहेगी। जब बच्चों की परिवेश ऐसी सोच के साथ होगी तो लड़कियां डरी-सहमी महिला बनेंगी और अपने साथ किसी प्रकार की ज़्यादती होने पर अपनी आवाज़ उठा ही नहीं पाएंगी। और वहीं लड़के क्रूर और हिंसक प्रवृत्ति वाले बनेंगे जिनके लिए लडकियां/महिलाएं खिलौना मात्र रह जायेंगी इंसान नहीं। ऐसे में खिलौनों की इज्ज़त कौन करता है और कौन सुनता है उनकी?

इस तरह की मानसिकता में मंझे हुए मर्द बाहर किसी लड़की/महिला को देखते ही शैतान की तरह उसपर झपटेंगे। (नोट: यहां शैतान की जगह जानवर का नाम हमने इसलिए नहीं लिया क्योंकि हमने जानवरों को ऐसा करते कभी देखा नहीं।)

जब मैंने बीबीसी द्वारा निर्मित इंडियाज डॉटर डॉक्यूमेंट्री (जो 16 दिसम्बर 2012 को हुए निर्भया गैंगरेप पर आधारित थी जिसे ब्रिटिश फिल्ममेकर, अभिनेत्री, निर्देशक, निर्माता और मानवाधिकार कार्यकर्ता लेस्ली उडविन ने व्यापक अनुसंधान कार्य के बाद बनाया था। हालांकि इसे भारत में ये कहकर प्रतिबंधित कर दिया गया था कि इससे दुनिया में भारत की बदनामी होगी) को देखा तो अपने पुरुष होने पर बेहद शर्म आई क्योंकि मैं उसी पुरुष जमात से आता हूं, जिस पुरुष जमात के लोगों ने उस भयानक और रूह कंपा देने वाले गैंगरेप को अंजाम दिया था।

इस डाक्यूमेंट्री में मुझे महिला और बलात्कार पर सभ्य और नागरिक समाज माने जाने वाले वकीलों की मानसिकता पता चली जिसे आप भी जानिए।

बलात्कारियों के बचाव पक्ष के वकील मनोहर लाल शर्मा ने कहा था,

हमारी सभ्यता सबसे अच्छी है। हमारी सभ्यता में महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। एक महिला का मतलब है कि मैंने तुरंत उसकी आंखों में कामोतेजना का भाव जगा दिया।

उसने आगे कहा,

एक औरत एक हीरा जैसी होती है। यदि आप उसे सड़क पर छोड़ोगे, तो कुत्ता आयेगा और उसे ले जायेगा।  

दूसरे बचाव पक्ष के वकील ए पी सिंह ने सार्वजनिक रूप से मीडिया में कहा,

यदि मेरी बेटी या बहन किसी बाहरी मर्द के साथ देर रात घूमने जाती है या शादी से पहले बाहर शारीरिक सम्बन्ध बनाती है यानि इस तरह समाज में हमारी इज्ज़त उछालती है तो मैं उसको अपने सभी परिवारजनों के सामने अपने फार्म हाउस के मैदान में आग लगा दूंगा।

जब ऐसे बयान और ऐसी मानसिकता सभ्य समाज से आने वाले पढ़े-लिखों द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाएगी तो जो पितृसत्ता और मर्दवादी मानसिकता के दलदल में एड़ी से चोटी तक धंसे हुए हैं उनके लिए तो ये सम्मान की बात बन जाएगी और अभी ऐसा ही होता रहा है।

इस डाक्यूमेंट्री में बलात्कार के दोषी मुकेश से पूछताछ में उसने बताया कि लड़कियों/औरतों का रेप इसलिए होता है क्योंकि वे गलत वक्त बाहर जाती हैं, छोटे और अंग दिखने वाले कपड़े पहनती हैं और लड़कों के साथ बहार घूमती हैं। ये सब सभ्य घरों की लड़कियां नहीं किया करती हैं तो ऐसे में इनको सबक सिखाने के लिए उनका बलात्कार किया जाता है। उसने ये भी कहा कि मैं और मेरे सभी साथी बचपन से ऐसे माहौल में बड़े हुए जिसमें अक्सर महिलाओं के साथ मारपीट और गाली-गलौज की जाती थी और इस हिंसा को महिलाएं चुपचाप सहन कर लेती थी, इस चुप्पी के कारण भी महिलाओं पर यौन हमला करना आसान हो जाता है।

अब इस बलात्कारी और उन वकीलों के बयान में क्या अंतर बचा? कोई अंतर नहीं क्योंकि वे दोनों ही एक मानसिकता के माहौल में पले-बढ़े हैं। इनके लिए स्त्री घर में तो देवी होती है लेकिन घर के बाहर इन्हें वेश्या से कम नज़र नहीं आती।

पुरुषप्रधान समाज में हमेशा द्वैतवादी सिद्धांत होते हैं यही सब बातें समाज में यौन अपराध को बल देती हैं। समाज में स्त्रियों के प्रति वर्षों का ये व्यवहार ही प्रथा में रहकर मानसिकता बन गई इसलिए यौन हिंसा मानसिक विकार से कहीं अधिक सामाजिक विकार है।

स्त्रियों का बलात्कार अधिकतर अपनी कुढ़न का, अहम का बदला लेने के लिए, उसे सबक सिखाने के लिए किया जाता है कि किसी लड़की ने मेरा प्रेम प्रस्ताव कैसे ठुकरा दिया, मुझे छोड़कर किसी और से दोस्ती क्यों की, अगले से बात ही क्यों की, देर रात को बाहर घूम रही है मतलब इसने हमारी महान सभ्यता और संस्कृति को खराब कर दिया और देर रात बाहर घूमने का मतलब ये सेक्स के लिए उपलब्ध है। जैसी बातें मर्दवादी व्यक्ति के अहम को बहुत ठेस पहुंचाती हैं और वो छेड़खानी से लेकर बलात्कार तक करने पर उतारू हो जाता है। इस तरह वो पुरुषप्रधानता ज़ाहिर करना चाहता है फिर चाहे वो रेप करके ही क्यों न ज़ाहिर करे।

छात्राओं पर पेशाब और वीर्य से भरे गुब्बारे फेंका जाना उसी कुढ़न का उदाहरण है। अब सवाल ये है कि आदमी इतनी आसानी से यौन हमला कर कैसे सकता है? तो सीधा जवाब है कि जब स्त्रियों को पूरी तरह से समाज में इंसान मान लेंगे, जब उन्हें ज़ेहन से बराबर मान लेंगे तब यौन अपराध में कमी लाना सम्भव हो जायेगा इस बात को हमें नैतिक शिक्षा में तरजीह देनी ही पड़ेगी स्कूली शिक्षा तो ज़रूरी है ही।

आज जब हमारे समाज में यौन हिंसा इतनी बढ़ गयी कि महिलाएं हर समय एक अव्यक्त दहशत में रहती हैं। ये दहशत ये खौफ किस कदर फैले हैं अपने साथ हुए एक वाकये के ज़रिये बताता हूं।

ये दिल्ली की एक बुरी याद है याद क्या कड़वी सच्चाई है। एक दिन मैं किसी काम से ग्रामीण सेवा गाड़ी में बैठकर मधुबन चौक जा रहा था तो आगे मानव चौक स्टॉप पर सवारी लेने के लिए गाड़ी रुकी। वहां करीब 75-76 वर्ष की एक दुबली-पतली सी कमज़ोर वृद्धा आयीं। वो अकेली थीं तो गाड़ी में उन्हें चढ़ने में दिक्कत हो रही थी तो मैंने उनकी बांह पकड़कर गाड़ी में अंदर चढ़ने के लिए मदद की लेकिन मेरे उनकी बांह पकड़ते ही वो एक अजीब से डर से सकुचा और सहम गयीं। फिर एक अंकल ने उन्हें चढ़ाने में मदद करने की कोशिश की लेकिन उन वृद्ध अम्मा ने उनकी भी मदद नहीं ली परन्तु जब एक महिला ने उन्हें चढ़ाने में मदद की और हैरानी की बात तो देखो कि वे उस महिला की मदद से गाड़ी में अंदर आराम से बैठ गयीं।

लेकिन मेरे अंदर एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ था तब जाकर मुझे समझ आया कि उनके अंदर पुरुषों का अव्यक्त डर बैठा हुआ था कि कहीं कोई कुछ गलत न कर दे उनके साथ जैसा कि रोज़ अख़बारों/टीवी में पढ़ने/देखने को मिलता है। आस-पास, रोज़ तीसरे-चौथे दिन कोई न कोई घटना घट जाती है। उन्हें गाड़ी में मौजूद पुरुषों पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं था कि जब हाथ मदद के लिए बढ़ाया गया तो मदद ही करेंगे। क्या पता उन जैसी कितनी महिलाओं ने पुरुषों पर भरोसा करना छोड़ दिया होगा और आगे कभी पुरुष वर्ग पर भरोसा कर भी पाएंगी कि नहीं?

पर एक बात साफ है कि हम पुरुषों ने महिलाओं का अपने ऊपर से भरोसा तो खोया है तो क्या कभी हम उन्हें फिर से भरोसा दे पाएंगे? ये हमें ही तय करना है। हमें समाज में महिलाओं को बराबरी का हक नहीं देना, हक देने वाले हम होते कौन हैं? बस उनके बराबर होने को मानना है और सम्मान देने से लेकर उन्हें इंसान मानने तक के मानकों और मानदंडों दोनों को बदलना ही चाहिए माने अब ढोंग-तमाशा से ऊपर उठ जाना चाहिए।

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